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बिहार चुनाव चुनाव आयोग की कड़ी परीक्षा

चुनाव आयोग के गले की हङ्ङी

तथ्य-प्रमाण संग उत्तरदायी पक्ष की अनदेखी

शीतकालीन संसद सत्र में भी हंगामे के आसार

  1. म. नसीम की रिपोर्ट

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बिहार में चुनाव के ऐन वक्त चल रहे चुनाव आयोग के मतदाता सूचियों के सघन निरीक्षण पर सवाल उठाती मीडिया कवरेज सुप्रीम कोर्ट में चुनाव आयोग के गले की कहीं हड्डी न बन जाए। इसीलिए कि सोशल ही नहीं मीडिया क्षेत्र के बङे समूह ने भी प्रक्रिया को आईना दिखाया है। यह रिपोर्ट यदि संज्ञान में लिया गया तो चुनाव आयोग की सारी मेहनत व्यर्थ हो न जाए । यही नहीं विपक्ष के जो तेवर इस मुद्दे को लेकर अब तक रहे हैं वह बेहद तीखे रहे। इसका आगाज तो शीतकालीन संसद सत्र में देखने को मिल सकता है।

मतदाता पुनरीक्षण फार्म में जलेबी बेची जाने, नाम दर्ज कराने के लिए रिश्वत लिए जाने, मरे हुऐ लोगों का भी सूचियों में नाम दर्ज होने आदि खबरें पूरी प्रक्रिया पर सनसनी फैलाती रही। चुनाव आयोग ही नहीं प्रशासनिक अमले की कार्य परायणता को भी कठघरे में खङा कर दिया। इन खबरों पर अपनी नब्ज टटोलने के बजाय मीडिया को ही आयोग ने निशाने पर ले लिया। गौरतलब है कि सारी कवरेज तथ्य और प्रमाण के साथ रही। अखबारों की रिपोर्ट सामने आने पर चुनाव आयोग खंडन का दबाब बनाने लगा। यहां तक कि सोशल मीडिया के यूट्यूबर अजीत अंजुम पर मुकदमा भी दर्ज करने की हिमाकत भी कर डाली। यह खबर फैलते ही मीडिया ने चुनाव आयोग के पुनरीक्षण कार्यक्रम पर जो कवरेज शुरु की उसे शायद चुनाव आयोग ही ने सपने में नहीं सोचा होगा। इसलिए कि आयोग पर सत्ता के पालनहार होने का आरोप तो काफी दिनो से लगता आ रहा ही है। ऐसे में यह भी हो सकता है कि यह अब प्रमाणितकता का जामा पहन ले। इसीलिए कि नागरिकता खंगालने का काम उसके दायरे का है ही नहीं। सुप्रीम कोर्ट की

पिछली सुनवाई में यह बात विपक्ष की ओर से उठ भी चुकी है। रह गया सवाल सुप्रीम कोर्ट के आधार, राशन कार्ड और पुराने मतदाता परिचय पत्र को प्रमाण सूचि में शामिल करने के आदेश पर ही चुनाव आयोग को मुंह की खानी पङी थी। वक्त कम होने की वजह से पहले से ही समय पर कार्य पूरा न होने की बात उठी थी। लेकिन , चुनाव आयोग को अपने दावे को पूरा करने के लिए मोहलत दे दी गई थी। 28 जुलाई को सुप्रीमकोर्ट में होने वाली सुनवाई के बाद सघन पुनरीक्षण पर आने वाला फैसला भी दिलचस्प हो सकता है। एक बात तो यह भी सामने आ ही गई कि

ख्यातिप्राप्त मीडिया समूह के शीर्षक्रम की ओर से एसआईआर की वकालत को उसी समूह की टीम ने पत्रकारिता का भी ककहरा पढा दिया । इनमें कुछ वह भी रहें जो अपने बैनर के निष्पक्षता का ढीढोरा पीटते रहते हैं।

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