वाराणसी। सनातन परंपराओं की जीवंत भूमि काशी सदैव से ही धर्म, आस्था और तप की राजधानी मानी जाती रही है। उसी भूमि पर गोमती नदी के शांत तट पर स्थित अमर भूमि आनंद वन क्षेत्र में अवस्थित प्राचीन शक्तिपीठ श्रीवन शक्ति देवी धाम आज एक बार फिर धार्मिक और सामाजिक कार्यों के कारण चर्चा का केंद्र बन गया। इस पावन धाम के पीठाधीश्वर श्रीश्री 1008 रतन वशिष्ठ जी महाराज, जो ऋषि सनातन धर्म संघ के संस्थापक और राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं, ने शनिवार को ऐसा कार्य किया जिसने आस्था के साथ-साथ मानवीय संवेदनाओं का भी सुंदर संदेश दिया।महाराज जी को जब यह ज्ञात हुआ कि एक गरीब मोची परिवार की कन्या का विवाह तय हुआ है और साधनहीन होने के कारण उसके पास विवाह हेतु पहनने को साड़ी तक उपलब्ध नहीं है, तो भक्तिभाव से परिपूर्ण गुरुजी ने न केवल चार साड़ियाँ प्रदान कीं बल्कि विदाई हेतु आर्थिक सहयोग भी किया। भाव-विभोर होकर उन्होंने इसे मां शक्ति देवी की प्रथम पूजा की संज्ञा दी और कहा कि जन्मों-जन्मांतर का पुण्य कन्यादान से बढ़कर कोई अन्य कर्म नहीं हो सकता। उनके इस कदम ने वहाँ उपस्थित श्रद्धालुओं के हृदय स्पंदनों को गहराई तक छू लिया और मंदिर परिसर तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा।इसी पावन अवसर पर धाम में एक और महत्वपूर्ण कार्य संपन्न हुआ। मंदिर के आंगन में आस्था और भक्ति का प्रतीक 51 किलो वजनी विशाल घंटा स्थापित किया गया। जैसे ही घंटा अपनी गूंज के साथ बजा, पूरे परिसर का वातावरण महाकालीन ऊर्जाओं से भर उठा। श्रद्धालुओं ने इसे युगों-युगों तक के लिए मंदिर की भव्यता में जोड़ने वाला अद्वितीय कार्य बताया।इस अवसर पर पीठाधीश्वर ने श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए यह भी घोषणा की कि आगामी 23 अक्टूबर से 29 अक्टूबर तक श्रीवन शक्ति देवी धाम परिसर में भव्य शिव महापुराण कथा का आयोजन किया जाएगा। उन्होंने कहा कि शिव ही सनातन धर्म के अद्वितीय आधार हैं और महापुराण कथा का श्रवण करना शिव की उपासना का सर्वोच्च मार्ग है। उनकी इस घोषणा से पूरे क्षेत्र के श्रद्धालुओं में हर्ष की लहर दौड़ गई और कथा आयोजन को लेकर जोर-शोर से तैयारियों की चर्चा शुरू हो गई।धर्म और सेवा के द्वार पर एकसाथ खड़े होकर जब समाज को दिशा देने वाले संत पीठाधीश्वर अपने कर्म से उदाहरण प्रस्तुत करते हैं, तो वह क्षण न केवल मंदिर और काशी के लिए बल्कि पूरे सनातन समाज के लिए ऐतिहासिक बन जाता है। आज श्रीवन शक्ति देवी धाम परिसर में घटित ऐसा ही दृश्य श्रद्धालुओं के साक्षी बना, जब आस्था ने सेवा का हाथ थामा और सेवा ने धर्म की प्रतिष्ठा को नई ऊँचाई दी।








