एम.नसीम
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देश को वीर सपूत देने वाले जिले में पुलिसिया दमन की जो इबारत रची गई वह बेहद ही निन्दनीय और जनाक्रोश पैदा करने वाली है। यह घटना तंत्र पर ही सवाल खङा कर रही है। कहना अनुचित न होगा कि ऐसी ही घटनाए शासन और प्रशासन के खिलाफ उग्र रूप धारण करती हैं। जनाक्रोश चरम पर होता है। विरोध प्रदर्शन की आग की लपटें दूर तक फैलती है। घटना के बाद गाजीपुर के लोगों ने जो सब्र दिखाया है नि:संदेह वह प्रसंशनीय है। यह अलग बात है कि अन्त्य परीक्षण में मौत का कारण हार्टअटैक बताया जा रहा है। यह भी एक गंभीर मामला है। परिजनों की ओर से इस रिपोर्ट पर भी सवालिया निशान लगाया गया है । भले ही घटना के बाद थाना प्रभारी समेत छह पुलिस कर्मियों को निलम्बित कर दिया गया। सरकार ने मुआवजा दे दिया है लेकिन, सत्तासीन पार्टी के जिस विकलांग कार्यकर्ता की मौत हुई है क्या उसे सरकार जिन्दा कर सकती है? सरकारी तंत्र के पास ऐसा कोई उपाय है। यह कहा जा सकता हैं कि यह कैसा सवाल है? तब सवाल उठता है कि जब आप जीवन नहीं दे सकते हैं तो मौत का अधिकार आपको किसने दे दिया। क्या कानून का इकबाल कायम है इसे दिखाने के लिए ही दिव्यांग सियाराम उपाध्याय को नोनहरा थाने की पुलिस ने लाइट बंद कर इतनी लाठियां तोङी की दूसरे ही दिन उसने दम तोङ दिया।
मजे कि बात तो यह है कि यह सबकुछ उस दिन हुआ जब केंद्र और राज्य की सारी सुरक्षा एजेंसियां पङोसी जिले में रही और मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ, प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदर दास मोदी समेत सत्ता नायकों का समूह माॅरिशस के प्रधानमंत्री के स्वागत में लगा था। जब अतिथि प्रस्थान कर गये तो घटना की सुधि ली गई । एसपी डा. ईरज राजा ने थाना अध्यक्ष वेंकटेश तिवारी समेत छह पुलिस कर्मियों को निलम्बित कर दिए । साथ ही अन्त्य परीक्षण के बाद मजिस्ट्रियल जांच कराने के भी आदेश दिए है। घटना को लेकर विपक्ष भी सत्ता पर हमलावर है। प्रदेश सरकार को ही कठघरे में खङा कर दिया। शनिवार को दिव्यांग सियाराम उपाध्याय की पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद यह कहा जाने लगा कि मौत का कारण हार्टअटैक रहा। हालांकि सरकार की ओर से दस लाख रुपये की मुआवजा राशि परिजनों को दी जा चुकी है।








